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जब प्रतीति की वर्कशॉप में आए थे। तो हमारी सोच “जेंडर” को लेकर कुछ अलग थी। लेकिन, तीन दिन की वर्कशॉप में शामिल होने के बाद मैंने लिंग भेदभाव लिंग आधारित हिंसा को समझा और जेंडर पर अपनी एक समझ बनायी।

प्रतीति की वर्कशॉप अभी तक की सभी वर्कशॉप में से सबसे अच्छी रही। जिसमें बहुत सारे दोस्त बने, मैंने बहुत कुछ सीखा। और सभी बातों को खुलकर रखा।

गतिविधियों के माध्यम से “जेंडर” को समझने में ज्यादा आसनी रही।

प्रतीति की वर्कशॉप में हमने अपने आप की एक पहचान खोजी। जिसे हम भूल जाते हैं कि हम क्या है और हमारे गुण या अवगुण क्या है हम दूसरों की बातें सुनकर अपनी पहचान खोजते हैं। लेकिन प्रतीति के माध्यम से अपने आप को जाना और पहचाना है।

प्रतीति वर्कशॉप वैसे तो सभी कुछ सीखने के लिए है लेकिन तीन महत्त्वपूर्ण topic हैं जो उमें एक सामाजिक कार्यकर्ता के लिए महत्त्वपूर्ण है जो मुझे लगता है और मैंने सीखा है

  1. धारणायें जिससे हम अपनी पूरी सोच समझ धाराणाओं पर बना लेते हैं जिससे हमारी सोच एक negative हो जाती है।
  2. एक व्यक्ति के जीवन में सहजता, असहजता घबराहट ये तीन परिस्थिति होती है लेकिन हमें खिंचाव में अपने आप को लाना है।
  3. सामाजिक शक्ति की हवा कभी सोचा भी नहीं था। ऐसी भी कोई चीज है। लेकिन ये हमारे जीवन में कितना असर कर रही है। हमारे हर निर्णय के पीछे सामाजिक शक्ति की हवा है।

अब हम community में काम करते हैं तो कहीं भी लिंग आधारित हिंसा होती है तो हम जल्द ही समझ जाते हैं कि ये किस लिए हो रही है, “जेंडर” के आधार पर या धारणा पर या सामाजिक शक्ति की हवा है।

“जब मैं मां के गर्भ में आयी

सबने मिलकर सोच बनायी।

लड़का है या लड़की भाई

लड़की है तो हम सोचेंगे

लड़का है तो खुद सोचेगा।।”

– कीर्ति प्रजापति